ऐ सबा ! मुस्तफ़ा से जा कहना, ग़म के मारे सलाम कहते हैं
सब्ज़-गुंबद की उन बहारों को दिल हमारे सलाम कहते हैं
ऐ सबा ! मुस्तफ़ा से कह देना, ग़म के मारे सलाम कहते हैं
याद करते हैं तुम को शाम-ओ-सहर, दिल हमारे सलाम कहते हैं
अल्लाह अल्लाह ! हुज़ूर की बातें, मरहबा ! रंग-ओ-नूर की बातें
चाँद जिन पर निसार होता है और सितारे सलाम कहते हैं
अल्लाह अल्लाह ! हुज़ूर के गेसू, भीनी भीनी महकती वो ख़ुश्बू
जिस से मा'मूर है फ़ज़ा हर-सू, वो नज़ारे सलाम कहते हैं
जब मुहम्मद का नाम आता है, रहमतों का पयाम आता है
लब हमारे दुरूद पढ़ते हैं, दिल हमारे सलाम कहते हैं
सब्ज़-गुंबद का आँख में मंज़र और तसव्वुर में आप का मिम्बर
सामने जालियाँ हैं रौज़े की, दिल हमारे सलाम कहते हैं
ज़ाइर-ए-तयबा तू मदीने में प्यारे आक़ा से इतना कह देना
आप की गर्द-ए-राह को, आक़ा ! चाँद-तारे सलाम कहते हैं
ज़िक्र था आख़री महीने का, तज़्किरा छिड़ गया मदीने का
हाजियो ! मुस्तफ़ा से कह देना, बे-सहारे सलाम कहते हैं
ऐ ख़ुदा के हबीब ! प्यारे रसूल ! ये हमारा सलाम कीजे क़ुबूल
आज महफ़िल में जितने हाज़िर हैं, मिल के सारे सलाम कहते हैं
ग़म के बादल तमाम छटने लगे, पर्दे आँखों से सारे हटने लगे
जो तलातुम बने हुए थे, सुहैल ! वो किनारे सलाम कहते हैं
ना'त-ख़्वाँ:
ओवैस रज़ा क़ादरी
मिलाद रज़ा क़ादरी
हाफ़िज़ ताहिर क़ादरी