नहीं ख़ुश-बख़्त मोहताजान-ए-'आलम में कोई हम सा
मिला तक़दीर से हाजत-रवा फ़ारूक़-ए-आ'ज़म सा
तेरा रिश्ता बना शीराज़ा-ए-जम'इय्यत-ए-ख़ातिर
पड़ा था दफ़्तर-ए-दीन-ए-किताबुल्लाह बरहम सा
मुराद आई, मुरादें मिलने की प्यारी घड़ी आई
मिला हाजत-रवा हम को दर-ए-सुल्तान-ए-'आलम सा
तेरे जूद-ओ-करम का कोई अंदाज़ा करे क्यूँकर
तेरा इक इक गदा फ़ैज़-ओ-सख़ावत में है हातिम सा
ख़ुदा-रा मेहर कर, ऐ ज़र्रा-परवर मेहर-ए-नूरानी !
सियाह-बख़्ती से है रोज़-ए-सियाह मेरा शब-ए-ग़म सा
तुम्हारे दर से झोली-भर मुरादें भर कर उट्ठेंगे
न कोई बादशाह तुम सा, न कोई बे-नवा हम सा
फ़िदा, ऐ उम्म-ए-कुलसूम ! आप की तक़दीर-ए-यावर के
'अली बाबा हुआ, दूल्हा हुआ फ़ारूक़-ए-अकरम सा
ग़ज़ब में दुश्मनों की जान है तेग़-ए-सर-अफ़ग़न से
ख़रूज-ओ-रफ़्ज़ के घर में न क्यूँ बरपा हो मातम सा
शयातीं मुज़्महिल हैं तेरे नाम-ए-पाक के डर से
निकल जाए न क्यूँ रफ़्फ़ाज़-ए-बद-अतवार का दम सा
मनाएँ 'ईद जो ज़िल-हिज्जा में तेरी शहादत की
इलाही ! रोज़-ओ-माह-ओ-सिन उन्हें गुज़रे मुहर्रम सा
हसन दर 'आलम-ए-पस्ती सर-ए-रिफ़'अत अगर दारी
बिया फ़र्क़-ए-इरादत बर दर-ए-फ़ारूक़-ए-आ'ज़म सा
शायर:
मौलाना हसन रज़ा ख़ान
ना'त-ख़्वाँ:
ओवैस रज़ा क़ादरी