असीरों के मुश्किल-कुशा, ग़ौस-ए-आ'ज़म !
फ़क़ीरों के हाजत-रवा, ग़ौस-ए-आ'ज़म !
गिरा है बलाओं में बंदा तुम्हारा
मदद के लिए आओ, या ग़ौस-ए-आ'ज़म !
तेरे हाथ में हाथ मैं ने दिया है
तेरे हाथ है लाज, या ग़ौस-ए-आ'ज़म !
मुरीदों को ख़तरा नहीं बहर-ए-ग़म से
कि बेड़े के हैं ना-ख़ुदा ग़ौस-ए-आ'ज़म
तुम्हीं दुख सुनो अपने आफ़त-ज़दों का
तुम्हीं दर्द की दो दवा, ग़ौस-ए-आ'ज़म !
भँवर में फँसा है सफ़ीना हमारा
बचा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! बचा, ग़ौस-ए-आ'ज़म !
ज़माने के दुख-दर्द की, रंज-ओ-ग़म की
तेरे हाथ में है दवा, ग़ौस-ए-आ'ज़म !
निकाला है पहले तो डूबे हुओं को
और अब डूबतों को बचा, ग़ौस-ए-आ'ज़म !
जिसे ख़ल्क़ कहती है प्यारा ख़ुदा का
उसी का है तू लाडला, ग़ौस-ए-आ'ज़म !
फँसा है तबाही में बेड़ा हमारा
सहारा लगा दो ज़रा, ग़ौस-ए-आ'ज़म !
मेरी मुश्किलों को भी आसान कीजे
कि हैं आप मुश्किल-कुशा, ग़ौस-ए-आ'ज़म !
वहाँ सर झुकाते हैं सब ऊँचे ऊँचे
जहाँ है तेरा नक़्श-ए-पा, ग़ौस-ए-आ'ज़म !
क़सम है कि मुश्किल को मुश्किल न पाया
कहा हम ने जिस वक़्त या ग़ौस-ए-आ'ज़म
बचा ले ग़ुलामों को मजबूरियों से
कि तू 'अब्द-ए-क़ादिर है, या ग़ौस-ए-आ'ज़म !
सरों पर जिसे लेते हैं ताज वाले
तुम्हारा क़दम है वो, या ग़ौस-ए-आ'ज़म !
अधर में, पिया ! मोरी डोलत है नैया
कहूँ का से अपनी बिथा, ग़ौस-ए-आ'ज़म !
बिपत में कटी मोरी सगरी 'उमरिया
करो मो पे अपनी दया, ग़ौस-ए-आ'ज़म !
कहे किस से जा कर हसन अपने दिल की
सुने कौन तेरे सिवा, ग़ौस-ए-आज़म !
शायर:
मौलाना हसन रज़ा ख़ान
ना'त-ख़्वाँ:
फ़रहान अली क़ादरी
सय्यिद कैफ़ी अली रज़वी